व्हेल (Whale) मछली नहीं है, बल्कि एक समुद्री स्तनधारी है। इसका इतिहास और विकास काफी दिलचस्प है। यहाँ व्हेल के इतिहास का संक्षिप्त वर्णन है:
उत्पत्ति और विकासप्राचीन पूर्वज:
लगभग 50 मिलियन साल पहले, व्हेल के पूर्वज भूमि पर रहने वाले स्तनधारी थे। पैकीसेटस (Pakicetus) नामक प्राचीन जीव का पता चला है, जो एक भूमि पर रहने वाला स्तनधारी था और माना जाता है कि यह व्हेल का पूर्वज था।अंबुलोसेटस: इसके बाद अंबुलोसेटस (Ambulocetus) आया, जिसे “वॉकिंग व्हेल” भी कहा जाता है। यह जीव जल और भूमि दोनों में रह सकता था और इसका जीवन दोनों वातावरण में बिताया जाता था।मोडोसेटस और अन्य प्रारंभिक व्हेल: धीरे-धीरे, मोडोसेटस (Rodhocetus) और अन्य प्रारंभिक व्हेल विकसित हुए, जो अधिक समय पानी में बिताने लगे और इनके अंग जल में तैरने के अनुकूल हो गए।
पूर्ण जलचर व्हेल:
लगभग 40 मिलियन साल पहले, व्हेल पूरी तरह से जलचर हो गईं। डोरूडॉन (Dorudon) और बसिलोसॉरस (Basilosaurus) जैसी प्रजातियाँ विकसित हुईं, जिनकी शारीरिक संरचना पूरी तरह से पानी में रहने के अनुकूल हो गई।विकास के प्रमुख चरणमाइसीनी व्हेल: वर्तमान समय की व्हेल दो मुख्य समूहों में विभाजित होती हैं: मिस्टिसीटी (Mysticeti) और ओडोंटोसेटी (Odontoceti)। मिस्टिसीटी व्हेल, जिन्हें बैलीन व्हेल भी कहा जाता है, फिल्टर फीडर होती हैं और छोटी मछलियाँ तथा प्लवक खाते हैं। ओडोंटोसेटी व्हेल में दांतेदार व्हेल शामिल हैं, जैसे डॉल्फिन, पोरपोइज़ और स्पर्म व्हेल।
शारीरिक अनुकूलन:
व्हेल की शारीरिक संरचना में कई अनुकूलन होते हैं, जैसे कि विशालकाय आकार, अत्यधिक विकसित सोनार प्रणाली (ओडोंटोसेटी में), और बैलीन प्लेट्स (मिस्टिसीटी में) जो उन्हें विशेष प्रकार के भोजन करने में सक्षम बनाती हैं।आधुनिक व्हेलआज की व्हेल विभिन्न प्रजातियों में पाई जाती हैं और इनके आकार में भी व्यापक विविधता होती है। ब्लू व्हेल सबसे बड़ी जीवित प्रजाति है, जो लगभग 100 फीट तक लंबी हो सकती है। इनका जीवन समुद्र में होता है और ये समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।संरक्षण20वीं शताब्दी में अत्यधिक शिकार के कारण व्हेल की आबादी में भारी कमी आई। अंतर्राष्ट्रीय व्हेलिंग आयोग (IWC) द्वारा 1986 में व्हेलिंग पर मोरेटोरियम लागू किया गया, जिससे व्हेल के संरक्षण में मदद मिली है। आज भी व्हेल संरक्षण के लिए प्रयास जारी हैं।व्हेल का इतिहास उनके भूमि पर रहने वाले पूर्वजों से लेकर पूर्ण जलचर स्तनधारी बनने तक के विकास की एक अद्भुत कहानी है, जो प्रकृति की अनुकूलन क्षमता को दर्शाती है।