स्वतंत्रता के पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं में संक्षेपित की जा सकती है:
कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था: भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर निर्भर थी। अधिकांश आबादी कृषि में संलग्न थी और कृषि उत्पादों का प्रमुख योगदान था। कृषि में प्राचीन तकनीक और उपकरणों का उपयोग होता था, जिससे उत्पादकता कम थी।
औद्योगिक पिछड़ापन: भारत में स्वतंत्रता से पहले बहुत कम उद्योग विकसित हो पाए थे। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत को मुख्यतः कच्चे माल के स्रोत और तैयार उत्पादों के लिए बाजार के रूप में इस्तेमाल किया गया। कुछ प्रमुख उद्योग जैसे कि जूट, कपास और इस्पात के उद्योग अवश्य थे, परन्तु उनका भी नियंत्रण ब्रिटिश हाथों में था।
गरीबी और भुखमरी: व्यापक गरीबी और भुखमरी prevalent थी। जनसंख्या का बड़ा हिस्सा निम्न जीवनस्तर में जी रहा था। भुखमरी और कुपोषण आम समस्याएं थीं, और कई बार अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती थी।
निर्यात और आयात असंतुलन: भारतीय निर्यात मुख्यतः कच्चे माल जैसे जूट, कपास, चाय, और तंबाकू पर आधारित था। इसके विपरीत, ब्रिटेन से भारी मात्रा में तैयार वस्त्र और अन्य सामान आयात किए जाते थे, जिससे व्यापार संतुलन भी बिगड़ा हुआ था।
प्राकृतिक संसाधनों का दोहन: ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय प्राकृतिक संसाधनों का भारी दोहन हुआ। कोयला, लौह अयस्क, और अन्य खनिज संसाधनों का व्यापक रूप से निर्यात किया गया, जिससे भारत को उनकी पूरी लाभ नहीं मिल पाई।
रोजगार और मजदूरी: रोजगार के अवसर बहुत सीमित थे और मजदूरी दर भी बहुत कम थी। बड़े पैमाने पर श्रमिकों का शोषण होता था, और उनके पास श्रमिक अधिकार भी बहुत सीमित थे।
शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं: शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी बहुत खराब थी। साक्षरता दर बहुत कम थी और स्वास्थ्य सुविधाएं नगण्य थीं।सारांश में, स्वतंत्रता के पूर्व भारतीय अर्थव्यवस्था कमजोर और ब्रिटिश शासन के अधीन थी। विकास और समृद्धि की दिशा में बहुत सारी चुनौतियां थीं जिन्हें स्वतंत्रता के बाद सुधारने की आवश्यकता थी।